जानलेवा और लाइलाज वायरस से एम्स में, 60 डॉक्टर-नर्सें व स्टाफ की जंग, वहीं रहना-खाना, इनके परिजन कई दिन से इन्हें देख नहीं पा रहे

रायपुर


कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए सरकार और शासन-प्रशासन ने पूरा दम लगाया है, लेकिन राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में 60 डाक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की एक ऐसी टीम है, जिसका सीधा मुकाबले इस अंजान लेकिन जानलेवा वायरस से है।  अब तक इनका चेहरा सामने नहीं लाया गया है, लेकिन ये टीम ऐसा संघर्ष कर रही है, जिसकी कल्पना से भी रोंगटे खड़े हो जाएं। अस्पताल में ही आइसोलेशन में, वहीं रहना-खाना, इनके परिजन कई दिन से इन्हें देख नहीं पा रहे हैं, फिर भी संघर्ष चल रहा है और कामयाबी भी मिल रही है। इन्हीं की मेहनत है कि प्रदेश के 10 में से 9 मरीज जो एम्स में भर्ती हुए, उनमें 8 स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। एकमात्र भर्ती मरीज भी खतरे से बाहर है। लेकिन अब इन योद्धाओं में से 15 लोग क्वारेंटाइन में जा चुके हैं। 


भास्कर ने लैब व मरीजों का इलाज कर रहे कुछ डॉक्टरों से बात की कि वे लैब व आइसोलेशन वार्ड में किस तरह की सावधानी बरत रहे हैं। जब किसी संदिग्ध मरीज को अस्पताल में लाया जाता है तो उनके स्वाब का सैंपल लैब टेक्नीशियन लेता है। ये माइक्रोबायोलॉजी विभाग के हैं। वायरोलॉजी लैब में एचओडी के नेतृत्व में बारीकी से जांच की जाती है। रिपोर्ट पॉजीटिव आने के बाद डॉक्टर इलाज करते हैं। मरीजों की देखभाल का जिम्मा नर्सों का है। इलाज से लेकर जांच में चेस्ट, माइक्रो बायोलॉजी व पीडियाट्रिक विभाग के डॉक्टरों की महत्वपूर्ण भूमिका है। 


वार्ड से निकलते ही जलाते हैं मास्क-ग्लव्ज
लैब व आइसोलेशन वार्ड में जाने के पहले डॉक्टर व टेक्नीशियन पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट पहनते हैं। ग्लव्ज व आंखों को ढंकने विशेष चश्मा भी। लैब से बाहर आते ही ग्लब्स व मॉस्क प्रिपरेशन रूम में जला देते हैं। इसके बाद खुद काे सेनेटाइज करते हैं। लैब में मोबाइल ले जाना भी मना है।


डॉक्टर के साथ स्टाफ को  भी संक्रमण की आशंका
सैंपल जांच करने वाले टेक्नीशियन से लेकर डॉक्टर व स्टाफ नर्स को मरीजों से संक्रमण का खतरा रहता है। इसलिए आइसोलेशन वार्ड या लैब में जाने के पहले पीपीई पहनना अनिवार्य है। इसके बाद भी डॉक्टरों व बाकी स्टाफ को कई सावधानी बरतनी पड़ती है। घर पहुंचने के पहले अच्छी तरह नहाते हैं, जिससे संक्रमण की आशंका बिल्कुल न रहें। गौरतलब है कि आठ मरीजों के इलाज के दौरान एम्स का कोई भी स्टाफ संक्रमित नहीं हुआ है। ये राहत की बात है। जबकि दूसरे राज्यों में मरीजों का इलाज करने वाले व कई स्टाफ को कोरोना पॉजीटिव हुआ है। 


अस्पताल में रहना-खाना
आयुष बिल्डिंग को आइसोलेशन वार्ड बनाया गया है। हर सप्ताह रोस्टर के अनुसार ड्यूटी लगाई जा रही है। इसके बाद उन्हें 14 दिन के होम क्वारेंटाइन पर भेजा जाता है। कोई लक्षण न मिलने पर उन्हें अपने घर जाने की अनुमति दी जा रही है। यही नहीं सभी के लिए आयुष बिल्डिंग में खाने व प्राइवेट वार्ड में रहने का इंतजाम किया गया है।